Wednesday, 7 June 2017

आयुर्वेद का उदभव

आयुर्वेद का उद्भव

गतांक से आगे




इस प्रकार धन्वन्तरि ने भी आयुर्वेद का प्रकाशन बह्मदेव द्वारा ही प्रतिपादित किया हुआ माना है । पुनः भगवान धन्वन्तरि ने कहा कि ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, उनसे अश्विनीकुमार द्वय तथा उनसे इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया । चरक संहिता तथा सुश्रुत संहिता में वर्णित इतिहास एवं आयुर्वेद के अवतरण के क्रम में क्रमशः आत्रेय सम्प्रदाय तथा धन्वन्तरि सम्प्रदाय ही मान्य है ।
चरक मतानुसार- आत्रेय सम्प्रदाय ।
सुश्रुत मतानुसार- धन्वन्तरि सम्प्रदाय ।
आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार शरीर, इंद्रिय, मन तथा आत्मा के संयोग को आयु कहते हैं। यह चार प्रकार की होती है :                        
सुखायु - किसी प्रकार के शारीरिक या मानसिक विकास से रहित होते हुए, ज्ञान, विज्ञान, बल, पौरुष, यश, परिजन आदि साधनों से समृद्ध व्यक्ति को सुखायु कहते हैं।

दुखायु - इसके विपरीत समस्त साधनों से युक्त होते हुए भी, शारीरिक या मानसिक रोग से पीडि़त अथवा निरोग होते हुए भी साधनहीन या स्वास्थ्य और साधन दोनों से हीन व्यक्ति को दु:खायु कहते हैं।

 हितायु - स्वास्थ्य और साधनों से संपन्न होते हुए या उनमें कुछ कमी होने पर भी जो व्यक्ति विवेक, सदाचार, सुशीलता, उदारता, सत्य, अहिंसा, शांति, परोपकार आदि आदि गुणों से युक्त होते हैं और समाज तथा लोक के कल्याण में व्यस्त रहते हैं उन्हें हितायु कहते हैं।

अहितायु - इसके विपरीत जो व्यक्ति अविवेक, दुराचार, क्रूरता, स्वार्थ, दंभ, अत्याचार आदि दुर्गुणों से युक्त और समाज तथा लोक के लिए अभिशाप होते हैं उन्हें अहितायु कहते हैं।
                                                                                                                                       क्रमशः

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